
दूदू जिले के फागी तहसील के भामाशाह गुरूजी श्री रामेश्वर प्रसाद धाभाई जो लौकिक रूप में धाभाई जी गुरूजी के नाम से मशहूर रहे हैं।
अपने सेवाकाल के दौरान कठोर अनुशासन से विद्यार्थियों में समय पाबंदी आदि की अनुपालना करवाते थे। जिसका परिणाम उस दौर में काफी राजकीय सेवा में और सफल व्यापारी, व्यवसायी , समाजसेवी, जनप्रतिनिधि बने। वो दौर सफलता का रहा।
फागी उच्च माध्यमिक विद्यालय 🏫 & आदर्श विद्या मंदिर के विकास के लिए जुझते रहे।
तत्कालीन प्राचार्य जी (उस समय पदनाम प्रधानाचार्य होता था । ) से विद्यार्थियों के हित में संघर्ष करते रहे।
ग़रीब & पिछड़े वर्ग में शिक्षा के प्रति लगन पैदा की।
इनका कठोर अनुशासन इस कदर जाना जाता था कि आज की तरह अभिभावक भी इनको विरोध दर्ज नहीं करवाते बल्कि विद्यार्थी / संतति को ही गलती पर डांटते थे।
सामाजिक सरोकारों से आप जुड़ें रहे। कोई सामाजिक पेंच उलझ जाता या आपसी मनमुटाव होता तो इनसे विद्यालय में भी सुलह करवाने या उसकी सहज, सरलीकरण व्याख्या समझने हेतु आते रहते थे।
👉🏾 धोलों – धोलो बुगला को सो बच्च्यो ! जैसे प्रिय स्थानीय भाषा में कविता/ गीत आदि गाकर आज के RTR / AZIM प्रेमजी Foundation
& Read A Thon 📖📚 जैसी गतिविधियां वो सहज में सरस गायन 👉🏾 नीला 🔵 🐎 घोड़ा रा असवार थारी दुधारी तलवार राणा सुनता ही जाज्योजी !
दया करना और दान का महत्व बताते हुए उनका प्रिय दादूदयाल वाणी में दोहा था –
मरना भला विदेश का जहां न अपना कोई।
माटी खायें जनावरा , महामहोत्सव होय।।
श्राद्धपक्ष में सच्ची श्रद्धांजलि उनके सीख का अनुकरण ही हैं।
हंसते गाते ठिठोली करते जब गाते तो बच्चे कठोर अनुशासन को भूलकर झूम उठते और रोचक समूहगान हो जाता था।
कपड़े धोकर साफ कर पहनना, रफू करवाना, बाल नाखून काटकर आना आदि वंदना सभा में हिदायतें देते और पर्यवेक्षण भी करते।
देर से आने वालों की अलग पंक्ति बनवाकर स्पष्टीकरण लेना।
वो कहते कि ठंडी रोटी & प्याज (कांदा)/ पिसी बांटी मिर्ची / गुड़ आदि लेकर आ जाओ किन्तु Late नहीं आना। क्योंकि उस दौर में सम्पूर्ण फागी और माधोराजपुरा संयुक्त प्रखंड में एक मात्र उच्च माध्यमिक विद्यालय था।
उन्होंने ने ही फागी , माधोराजपुरा, नीमेड़ा & मौजमाबाद 04 Schools 🏫 पर सबसे पहले राज्य सरकार से फागी में महाविद्यालय खोलने की मांग की थी । जो सपना काफी अर्से बाद साकार भी हुआ।
आज PM श्री GSSS फागी 🏫 की नींव की ईंट वो रहे है।
तत्कालीन माध्यमिक कक्षाओं में लाल केला , नींव की ईंट ✅ आदि उनके Favourite पाठ होते थे।
मुझे याद है कि उस कालखंड में स्थानीय विद्यालय में अपनी कक्षा में Academic Record सतत् श्रेष्ठतम रहने के बावजूद एक दिन विलंब हो गया।
सबकी तरह मैं भी सहमा और दुबका था वो ज्यादा विलंब से आने वाले को अपने तरीके से अभिनन्दन/ स्वागत करते थे!
किन्तु सबको डांटकर मुझे यह कहकर छोड़ दिया कि तू अपने आपको Professor (आचार्य) समझता है और हाथ खींचकर आगे बढ़ा दिया। मेरे को यह घटना अविस्मरणीय हो गई और सहमकर आगे बढ़कर कक्षा में भागकर बैठ गया। आगे से Late ना होने का पाठ इस तरह पढ़ा भी दिया।
उनके दौर में उपलब्ध जगह में विद्वान चंडीप्रसाद जी के सानिध्य में मां शारदा का मंदिर भी बना था वो अब नहीं है वास्तु अनुसार पूर्वाभिमुख पुनर्स्थापना हो चुकी है।
विद्यार्थी प्रतिनिधि के रुप में आपने मुझे अर्चना का अवसर प्रदान किया।
सहशैक्षिक गतिविधियों के आप प्रेरक थे।
एक वाकया प्रसिद्ध था –
एक उच्च शिक्षा अधिकारी ने प्रार्थना सभा में सबके सामने 👉🏾 विद्यालय परिसर के पिछड़े / अविकसित होने अर्थात कटीली बाढ़-धांसड़ी होने से गुस्सा होकर कह दिया कि क्या भटियार खाना बना रखा है ?
इनका परिश्रम, समर्पण & स्वाभिमान जागृत हो गया और सविनय उनको विद्यालय बिना निरीक्षण के लौट जाने का सम्मुख दुसाहस किया।
अधिकारी का अहम टकरा (Ego Heart ) गया और वो कह गये कि अपने बोरिया बिस्तर समेट लो।
उन दिनों स्थानांतरण का Power अधिकारी को होता था।
आप आगामी कार्य दिवस को बिठा बिस्तर बांधकर स्वयं ही जयपुर कार्यालय में उपस्थित हो गये और का अधिकारी हतप्रभ हो गया!
इन्होंने पूछने पर समझाया कि आप तो वर्ष में एक दिन पधारे हो , शिक्षकों को रोज़ वहां आत्मसम्मान से रहना हैं।
ऐसे आत्मसम्मान से भरपूर और सांस्कृतिक आदर्शवाद से ओत-प्रोत गुरूजी ने अपनी संतति का नाम भी गोविन्द, केशव और माधव ✅ रखा।
स्वर्गीय गुरूजी की आत्मा को परमात्मा निज चरणों में स्थान देवे।
शेष परिजनों, स्नेहीजनों & संबंधियों शिष्यों को कष्ट सहन करने की शक्ति देवे।
आपने सार्थक जीवन जीया है और संतति सभी प्रगतिशील हैं।








